"#Delhi के कोने-कोने में सार्वजनिक शौचालय बने हुए हैं. लेकिन आपने गौर किया होगा इन शौचालय के बाहर 'पुरुष' और 'स्त्री' लिखा रहता है. जब कानून ने हमको तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी है तो सरकार यह भेदभाव क्यों कर रही है." यह शब्द माहिरा कुरैशी के हैं.
25 वर्षीय माहिरा रिसेप्शनिस्ट की नौकरी करती हैं. उनका कहना है कि दिल्ली में #Transgender समुदाय के लिए #PublicToilet न होने के कारण प्रतिदिन उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
"अधिकतर किन्नर, महिलाओं के लिए बनाए गए शौचालय का उपयोग करते हैं. लेकिन जब हम उनके टॉयलेट में जाते हैं तो वो हमें घूरकर देखने लगती हैं. उन्हें असहज लगने लगता है कि ट्रांसजेंडर लेडीज़ शौचालय में क्यों आ गए. बहुत बार कार के पीछे जगह ढूंढ़नी पड़ती है. ऐसे में बहुत शर्मिंदगी महसूस होती है." माहिरा आगे कहती हैं.
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